गुरुवार, 3 मार्च 2011

समाज में धर्माचरण से ही ब्राह्मण का वर्चस्व एवं उत्कर्ष होता है

अनादिकाल से ब्राह्मण अपने धर्माचरण के बल पर प्रतिष्ठित रहा है. पहले शिक्षा, धर्म, संस्कार, तप, ब्रह्मचर्य तथा संयम इन गुणों से युक्त एवं संस्कारित व्यक्ति ही ब्राह्मण को प्राप्त होता था और इन गुणों से हीन व्यक्ति शूद्र हो जाता था. मनुस्मृति में कहा गया है – 'जन्मना जायते शूद्र संस्कारद द्विज उच्यते'. – अर्थात माँ के गर्भ से सभी शूद्र [संस्कारहीन] उत्पन्न होते हैं किन्तु दुबारा जब उन्हें उपनयन आदि संस्कारों से समन्वित करके तप, संयम एवं धर्माचरण के योग्य बना दिया जाता है तब वह द्विज कहलाता है. 

द्विज का अर्थ होता है – 'द्वाभ्यां संस्कारभ्यां जायते इति द्विजः' अर्थात जिसके दो संस्कार हों वह द्विज होता है. एक संस्कार माँ के गर्भ से उत्पन्न होने के बाद होता है जिसे 'जातकर्म' कहते हैं और दूसरा कुछ बड़े होने पर होता है जिसे 'उपनयन' संस्कार कहते हैं. उपनयन संस्कार से ही बालक को गायत्री मंत्र का ज्ञान कराया जाता है और इस प्रकार बालक को तप एवं संयम की ओर प्रवृत्त किया जाता है – ये दो संस्कार ब्राह्मण, क्षत्रिय एवं विषयों के होते हैं और इसीलिए इन तीनों वर्गों को द्विज माना जाता है. 

... जारी

4 टिप्‍पणियां:

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